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जल अर्पण दिवस: जब गांवों ने अपने जल तंत्र की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली
- जल जीवन मिशन की योजनाओं के हस्तांतरण से आगे बढ़कर स्वामित्व, सहभागिता और सतत जल प्रबंधन की नई शुरुआत

24 Sep, 2026


जल केवल जीवन का आधार नहीं, बल्कि गांव के भविष्य की नींव भी है। किसी गांव में नल से पानी पहुंच जाना इस यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की शुरुआत है, जिसे लंबे समय तक चलाने, सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी सोच को जमीन पर साकार करने की दिशा में ‘जल अर्पण दिवस’ एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।

जल अर्पण दिवस के माध्यम से जल जीवन मिशन के तहत निर्मित पाइप्ड पेयजल योजनाओं का औपचारिक हस्तांतरण ग्राम पंचायत और ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति को किया जाता है। लेकिन यह प्रक्रिया महज प्रशासनिक हस्तांतरण नहीं है। यह गांव को उसके पेयजल तंत्र का स्वामित्व सौंपने और सामुदायिक जिम्मेदारी स्थापित करने का अवसर है।

निर्माण से संधारण तक जिम्मेदारी का विस्तार—
जल अर्पण दिवस के बाद गांव स्वयं अपने पेयजल तंत्र के संचालन, संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालता है। इससे ग्रामीणों को यह स्पष्ट होता है कि गांव में कौन-कौन सी पेयजल परिसंपत्तियां विकसित हुई हैं, उनका संचालन कौन करेगा, रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी और आवश्यकता पड़ने पर सहयोग किस स्तर से मिलेगा। इससे भूमिकाओं की स्पष्टता, पारदर्शिता और सामुदायिक विश्वास मजबूत होता है।

यही वह बिंदु है जहां एक सरकारी योजना, गांव की अपनी व्यवस्था बनती है। जब ग्रामीण किसी जल योजना को केवल सरकार द्वारा बनाई गई सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सामुदायिक संपत्ति के रूप में देखते हैं, तो उसके संरक्षण और सतत संचालन की संभावना भी मजबूत होती है।

हस्तांतरण से पहले तकनीकी कसौटी पर योजनाओं की परख—
जल अर्पण से पहले योजनाओं को अनिवार्य 15 दिवसीय ट्रायल रन से गुजरना होता है। इस दौरान सभी क्रियाशील FHTC, पानी के दबाव और आपूर्ति की नियमितता की जांच की जाती है तथा ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति द्वारा इसका प्रमाणीकरण किया जाता है। साथ ही, हस्तांतरण से पहले ग्राम पंचायत को एज बिल्ट ड्राइंग, पंप एवं उपकरणों की सूची, परिसंपत्ति रजिस्टर, ट्रायल रन रिपोर्ट, जल गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, संचालन एवं संधारण योजना और संपर्क सूची जैसी आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई जाती है।

इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य स्पष्ट है - गांव को केवल योजना नहीं, बल्कि एक तैयार और व्यवस्थित जल व्यवस्था सौंपना।

राजस्थान में सामुदायिक भागीदारी का बढ़ता दायरा—
भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप राजस्थान में अब तक लगभग 2490 गांवों में जल अर्पण दिवस मनाया जा चुका है। 16 अगस्त 2026 को प्रदेश के 1500 गांवों में एक साथ जल अर्पण दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भीलवाड़ा के 772, डीडवाना-कुचामन के 210 और अलवर के 130 गांवों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया।

यह आंकड़े केवल आयोजन की संख्या नहीं हैं। इनके पीछे गांवों में विकसित हो रही उस सोच को देखा जा सकता है, जिसमें पेयजल व्यवस्था को सामुदायिक संपत्ति और सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।

‘जल अर्पण’ बना लोक उत्सव—
जल अर्पण दिवस को केवल सरकारी कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा गया। ट्रांसेक्ट वॉक, जल वंदना, जल श्रृंगार और जल शपथ जैसी गतिविधियों के माध्यम से इसे सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव से जोड़ा गया। पेयजल परिसंपत्तियों के सम्मान में जल बंधन और ‘लोक जल उत्सव’ जैसे आयोजनों ने इस अवसर को जनभागीदारी का स्वरूप दिया।

दरअसल, किसी जल योजना की असली सफलता उसके निर्माण में नहीं, बल्कि उसके सतत संचालन और समुदाय से जुड़ाव में निहित है। जल अर्पण दिवस इसी सोच को संस्थागत रूप देने का प्रयास है - जहां विभाग निर्माण की जिम्मेदारी पूरी करता है और गांव उसके संरक्षण की जिम्मेदारी स्वीकार करता है।

अब जल व्यवस्था ‘सरकार की योजना’ नहीं, ‘गांव की अपनी संपत्ति’—
जल अर्पण दिवस का व्यापक संदेश यही है कि पानी की उपलब्धता जितनी जरूरी है, उसकी व्यवस्था के प्रति स्वामित्व की भावना भी उतनी ही जरूरी है। जब ग्राम पंचायत, VWSC और ग्रामीण मिलकर पेयजल परिसंपत्तियों की जिम्मेदारी संभालते हैं, तो जल जीवन मिशन का उद्देश्य केवल ‘हर घर नल से जल’ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हर घर तक निरंतर, सुरक्षित और टिकाऊ पेयजल सेवा सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ता है।

जल अर्पण वास्तव में जल अधिकार के साथ जल दायित्व को जोड़ने की पहल है - सामाजिक सहभागिता से सेवा, सुदृढ़ीकरण और सततता की ओर बढ़ता राजस्थान।
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मानसिंह/प्रियंका